USSTC-2026: उत्तराखण्ड में अनुसंधान एवं विकास की संभावनाओं पर मंथन
देहरादून। उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकॉस्ट) द्वारा विज्ञान धाम में आयोजित 21वें उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सम्मेलन (USSTC-2026) के दूसरे दिन विमर्श सभागार में “उत्तराखण्ड में अनुसंधान एवं विकास परिदृश्य” विषय पर विचार-मंथन सत्र का आयोजन किया गया। सत्र की अध्यक्षता आईआईटी रुड़की के प्रो. नवीन कुमार नवानी और सह-अध्यक्षता आईसीएफएआई विश्वविद्यालय देहरादून…
- विज्ञान और शोध के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले युवा शोधकर्ताओं को Young Scientist Award
- आज 25 अक्टुबर को 21वें उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सम्मेलन का देहरादून में भव्य शुभारंभ हुआ
- वैज्ञानिक अनुसंधान, नवाचार एवं सतत विकास पर हुआ मंथन
देहरादून : उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकॉस्ट) द्वारा विज्ञान धाम, देहरादून में 21वें उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सम्मेलन (USSTC-2026) का शुभारंभ किया गया। सम्मेलन का उद्घाटन सत्र विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अनुसंधान एवं नवाचार के माध्यम से राज्य और देश की प्रमुख चुनौतियों के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण रहा।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री, पुष्कर सिंह धामी ने वीडियो संदेश के माध्यम से प्रतिभागियों को संबोधित किया।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के कैबिनेट मंत्री प्रदीप बत्रा उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि रहे। अपने संबोधन में कैबिनेट मंत्री प्रदीप बत्रा ने कहा कि विज्ञान व प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उत्तराखंड तेजी से विकास कर रहा है. उन्होंने कहा हमें अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं की पहचान कर उनके वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक समाधान खोजने की दिशा में कार्य करना चाहिए। उन्होंने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के प्रभावी उपयोग, अनुसंधान तथा नवाचार को समाज की आवश्यकताओं से जोड़ने के महत्व पर बल दिया।
इस अवसर पर यूकॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी नीति–2026 के प्रमुख उद्देश्यों तथा इसके अंतर्गत विज्ञान, अनुसंधान एवं नवाचार को प्रोत्साहित करने के प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में समन्वय, ज्ञान के आदान-प्रदान तथा वैज्ञानिक अनुसंधान को समाज की आवश्यकताओं से जोड़ने के महत्व पर प्रकाश डाला। साथ ही, उन्होंने ‘विज्ञान सेतु’ पहल के बारे में जानकारी देते हुए विज्ञान एवं समाज के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने, वैज्ञानिक ज्ञान एवं उपलब्धियों को व्यापक स्तर पर पहुँचाने तथा विभिन्न हितधारकों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने की दिशा में ऐसी पहलों की भूमिका को रेखांकित किया ।उद्घाटन सत्र में मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहनी, सीएसआईआर–भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (आईआईपी), देहरादून की निदेशक डॉ. दर्शना जोशी, विज्ञानशाला के निदेशक केशव आशीष तथा विज्ञान भारती के संगठन मंत्री सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। इस अवसर पर सम्मेलन की सार-संक्षेप पुस्तिका (Abstract Book) का विमोचन भी किया गया। सम्मेलन का प्रमुख उद्देश्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रहे नवीनतम विकास, तकनीकी प्रगति तथा क्षेत्रीय एवं राष्ट्रीय चुनौतियों के समाधान में उनकी उपयोगिता पर विचार-विमर्श करना है। सम्मेलन के प्रथम दिवस 13 तकनीकी प्रभागों के अंतर्गत 260 से अधिक शोध-पत्र मौखिक प्रस्तुतियों एवं पोस्टर प्रस्तुतियों के माध्यम से प्रस्तुत किए गए। इन प्रस्तुतियों ने शोध निष्कर्षों के आदान-प्रदान, युवा शोधकर्ताओं को प्रोत्साहन तथा विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों के बीच संवाद के लिए महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया। तकनीकी सत्रों में कृषि विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान एवं वानिकी; जैव प्रौद्योगिकी, जैव रसायन एवं सूक्ष्मजीव विज्ञान; रासायनिक विज्ञान; भू-विज्ञान; इंजीनियरिंग विज्ञान, पदार्थ विज्ञान एवं नैनो प्रौद्योगिकी; गृह विज्ञान, स्वास्थ्य एवं पोषण; गणित एवं सांख्यिकी; कंप्यूटर विज्ञान एवं उभरती प्रौद्योगिकियाँ; चिकित्सा एवं औषध विज्ञान; भौतिक विज्ञान; ग्रामीण विज्ञान एवं विज्ञान और समाज; प्राणी विज्ञान, पशु चिकित्सा विज्ञान एवं पशुपालन तथा ‘वर्ष का सर्वश्रेष्ठ नवाचारकर्ता’ (Innovator of the Year) श्रेणी को शामिल किया गया। सम्मेलन में विशेष रूप से उभरती प्रौद्योगिकियों, अंतर्विषयक अनुसंधान, नवाचार-आधारित विकास तथा हिमालयी क्षेत्र की विशिष्ट चुनौतियों एवं संभावनाओं के समाधान में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की भूमिका पर बल दिया गया। साथ ही, सतत विकास के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करने तथा अनुसंधान को समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने पर भी चर्चा की गई। उद्घाटन सत्र के दौरान ‘विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार (STI) नीति : विकसित भारत, सशक्त उत्तराखंड 2047’ विषय पर विचार-मंथन सत्र आयोजित किया गया। इस सत्र में विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार की भावी दिशा, राज्य के विकास में अनुसंधान की भूमिका तथा वैज्ञानिक उपलब्धियों को विकास की प्राथमिकताओं से जोड़ने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विमर्श किया गया। इसके अतिरिक्त, विज्ञान संचार तथा विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं नवाचार नीति पर एक विशेष सत्र आयोजित किया गया, जिसमें प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के प्रतिनिधियों एवं प्रख्यात पत्रकारों ने भाग लिया। सत्र में विज्ञान संचार को सरल, सहज एवं जनसुलभ बनाने, वैज्ञानिक अनुसंधान और जनसंचार के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने तथा वैज्ञानिक उपलब्धियों को आमजन तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने पर विचार-विमर्श किया गया। इस दौरान वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने, अनुसंधान एवं नवाचार को व्यापक पहचान दिलाने तथा वैज्ञानिक संस्थानों और समाज के बीच संवाद को सुदृढ़ करने में मीडिया की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया। सम्मेलन के अंतर्गत द्वितीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी प्रीमियर लीग का भी आयोजन किया गया, जिसमें माननीय कैबिनेट मंत्री श्री गणेश जोशी मुख्य अतिथि रहे। इस पहल का उद्देश्य प्रतिभागियों, विशेषकर युवाओं में विज्ञान के प्रति रुचि, सहभागिता एवं वैज्ञानिक गतिविधियों के प्रति उत्साह को बढ़ावा देना है। इसके माध्यम से विज्ञान को अधिक संवादात्मक, रोचक एवं सहभागितापूर्ण बनाने का प्रयास किया जा रहा है। सम्मेलन में ‘लैब ऑन व्हील्स’ (Lab on Wheels) अभिमुखीकरण कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। यह पहल वैज्ञानिक प्रयोगों, गतिविधियों एवं ज्ञान को व्यापक स्तर पर पहुँचाने तथा विद्यार्थियों एवं आमजन में वैज्ञानिक जिज्ञासा विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण है। सम्मेलन परिसर में 60 से अधिक वैज्ञानिक एवं शिक्षण संस्थानों तथा स्टार्टअप्स द्वारा प्रदर्शनी भी लगाई गई। प्रदर्शनी में वैज्ञानिक उपलब्धियों, अनुसंधान पहलों, तकनीकी नवाचारों, उभरते समाधानों तथा उद्यमशीलता से संबंधित प्रयासों को प्रदर्शित किया गया। इसने प्रतिभागी संस्थानों, शोधकर्ताओं एवं नवाचारकर्ताओं को अपने कार्यों और उपलब्धियों को प्रस्तुत करने, विचारों का आदान-प्रदान करने तथा संभावित सहयोग के अवसर तलाशने के लिए साझा मंच उपलब्ध कराया। प्रदर्शनी के माध्यम से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के व्यावहारिक अनुप्रयोगों, अनुसंधान आधारित समाधानों तथा नवाचार की संभावनाओं को सामने लाने का प्रयास किया गया। 21वाँ उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सम्मेलन राज्य के वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यह सम्मेलन अनुसंधान, शिक्षा, शासन, उद्योग, मीडिया एवं नवाचार से जुड़े विभिन्न हितधारकों को एक साझा मंच प्रदान कर रहा है। सम्मेलन के माध्यम से वैज्ञानिक ज्ञान के आदान-प्रदान, अंतर्विषयक सहयोग, युवा शोधकर्ताओं को प्रोत्साहन तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आधारित समाधानों को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं। विशेष रूप से उत्तराखंड के हिमालयी भू-भाग, पर्यावरण, कृषि, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास एवं अन्य क्षेत्रीय आवश्यकताओं से जुड़ी चुनौतियों के समाधान में वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचार की भूमिका को रेखांकित किया गया। यह सम्मेलन वैज्ञानिक समुदाय, नीति-निर्माताओं, शिक्षण संस्थानों, उद्योग जगत एवं समाज के बीच सार्थक संवाद स्थापित करने के साथ-साथ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को राज्य के सतत, समावेशी और नवाचार-आधारित विकास से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। सम्मेलन में लगभग 1,000 शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, विद्यार्थियों, नवाचारकर्ताओं, नीति-निर्माताओं, प्रशासनिक अधिकारियों, उद्यमियों तथा विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों ने सहभागिता की
- ऋषभ पाल, प्रदेश प्रवक्ता, भाजपा युवा मोर्चा, उत्तराखंड
देहरादून : महर्षि वाल्मीकि जी केवल एक महर्षि या आदिकवि ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, ज्ञान, साहित्य और सामाजिक चेतना के ऐसे महान प्रतीक हैं, जिनका योगदान युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करता रहेगा। उनकी लेखनी ने भगवान श्रीराम के जीवन, आदर्शों और मर्यादा को जन-जन तक पहुँचाने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। यदि महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण की रचना न की होती, तो भगवान श्रीराम के जीवन की गाथा और उनके आदर्शों का परिचय मानव समाज तक किस रूप में पहुँचता, इसकी कल्पना करना भी कठिन है। नवरात्रों की आस्था, दशहरे में अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश और दीपावली के साथ जुड़ी भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी की परंपरा भारतीय जनमानस में जिस प्रकार रची-बसी है, उसमें रामायण की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है।
महर्षि वाल्मीकि जी का जीवन हमें सिखाता है कि मनुष्य की महानता उसके जन्म या परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, विचारों, कर्मों और समाज को दिए गए योगदान से निर्धारित होती है। उनसे जुड़ी प्रचलित लोककथाएँ आत्मपरिवर्तन, तपस्या और सद्मार्ग की प्रेरणा देती हैं। उनका व्यक्तित्व इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान की शक्ति किसी भी व्यक्ति के जीवन को नई दिशा दे सकती है। आज आवश्यकता है कि हम महर्षि वाल्मीकि जी के जीवन और कृतित्व को केवल स्मरण करने तक सीमित न रखें, बल्कि उनके विचारों को अपने आचरण में भी उतारें।
महर्षि वाल्मीकि जी द्वारा रचित रामायण में भगवान श्रीराम के माध्यम से मर्यादा, कर्तव्य, त्याग, न्याय और लोककल्याण के आदर्श प्रस्तुत किए गए हैं। यह महाकाव्य हमें बताता है कि सच्चा नेतृत्व वही है जो समाज के अंतिम व्यक्ति के हितों की चिंता करे, अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करे और कठिन परिस्थितियों में भी अपने सिद्धांतों से विचलित न हो। यही आदर्श आज के सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने सदियों पहले थे।
मेरा मानना है कि महर्षि वाल्मीकि जी के विचारों को आगे बढ़ाने का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा और संस्कार हैं। जब समाज का प्रत्येक बच्चा शिक्षित होगा, प्रत्येक युवा आत्मनिर्भर बनेगा और प्रत्येक परिवार को सम्मान एवं अवसर प्राप्त होंगे, तभी एक सशक्त और समरस भारत का निर्माण संभव होगा। समाज में जातिगत भेदभाव, अस्पृश्यता और ऊँच-नीच की भावना के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। हमें ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहाँ किसी भी युवा की पहचान उसकी जाति से नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा, मेहनत, चरित्र और उपलब्धियों से हो।
आज का युवा भारत की सबसे बड़ी शक्ति है। महर्षि वाल्मीकि जी की विरासत हमें प्रेरित करती है कि युवा केवल अपने व्यक्तिगत विकास तक सीमित न रहें, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी समझें। शिक्षा, सामाजिक सेवा, राष्ट्र निर्माण और जरूरतमंदों के उत्थान के लिए आगे आना ही सच्ची सामाजिक चेतना है। विकसित भारत 2047 का लक्ष्य तभी साकार होगा, जब देश का प्रत्येक वर्ग विकास की मुख्यधारा में सहभागी बनेगा और प्रत्येक युवा को आगे बढ़ने का समान अवसर मिलेगा।
महर्षि वाल्मीकि जी किसी एक वर्ग या समुदाय की धरोहर नहीं, बल्कि संपूर्ण भारतवर्ष की अमूल्य सांस्कृतिक विरासत हैं। उनका सम्मान करना, उनके साहित्य का अध्ययन करना और उनके आदर्शों को समाज में स्थापित करना हम सभी का दायित्व है। हमें ऐसे आयोजन करने चाहिए, जिनके माध्यम से युवाओं को शिक्षा के प्रति प्रेरित किया जाए, प्रतिभाओं को सम्मान मिले और समाज में एकता, भाईचारे तथा सद्भाव की भावना मजबूत हो।
इसी भावना के साथ मेरा प्रयास है कि महर्षि वाल्मीकि जी के आदर्शों को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए और युवाओं को ज्ञान, संस्कार, सेवा तथा राष्ट्रवाद के मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए। मेरा विश्वास है कि जब हम महर्षि वाल्मीकि जी के विचारों को अपने जीवन का हिस्सा बनाएँगे, तभी सामाजिक समरसता का संकल्प मजबूत होगा और भारत अपनी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत के साथ विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में और अधिक मजबूती से आगे बढ़ेगा।
आइए, हम सभी संकल्प लें कि महर्षि वाल्मीकि जी के ज्ञान और आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाएँगे, शिक्षा को प्रोत्साहित करेंगे, समाज के प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान देंगे और जाति तथा क्षेत्र के भेदभाव से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखेंगे। यही आदिकवि महर्षि वाल्मीकि जी के चरणों में हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।



